झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का इतिहास | Rani LakshmiBai Jhansi, Jhansi Wali Rani

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का इतिहास | Rani Lakshmi Bai Jhansi

Rani Laxmi Bai in Hindi

लक्ष्मीबाई उर्फ़ झाँसी की रानी मराठा शासित राज्य झाँसी की रानी थी। जो उत्तर-मध्य भारत में स्थित है। रानी लक्ष्मीबाई 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना थी जिन्होंने अल्पायु में ही ब्रिटिश साम्राज्य से संग्राम किया था।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का इतिहास – Rani Laxmi Bai History in Hindi

  • नाम (Childhood Name) रानी लक्ष्मीबाई (मणिकर्णिका तांबे) मनु बाई
  • जन्म (Birthday) 19 नवंबर 1828
  • जन्मस्थान (Birthplace) वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
  • माता का नाम (Mother Name) भागीरथी बाई
  • पिता का नाम (Father Name) मोरोपंत तांबे
  • विवाह तिथि (Marriage) 19 मई 1842
  • पति (Husband Name) झांसी नरेश महाराज गंगाधर राव नेवालकर
  • संतान (Son Name) दामोदर राव, आनंद राव (दत्तक पुत्र)
  • घराना मराठा साम्राज्य
  • उल्लेखनीय कार्य 1857 का स्वतंत्रता संग्राम
  • धार्मिक मान्यता हिन्दू
  • जाति मराठी ब्राह्मण
  • राज्य झांसी
  • शौक घुड़सवारी करना, तीरंदाजी
  • मृत्यु (Death) 18 जून 1858
  • मृत्यु स्थल कोटा की सराय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश, भारत

झांसी की रानी का जीवन परिचय – About Rani Laxmi Bai in Hindi

वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई जिन्होनें अपने साहसी कामों से ने सिर्फ इतिहास रच दिया बल्कि तमाम महिलाओं के मन में एक साहसी ऊर्जा का संचार किया है रानी लक्ष्मी बाई जिन्होनें अपने साहस के बल पर कई राजाओं को हार की धूल चटाई। महारानी लक्ष्मी बाई ने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए कई लड़ाई लड़कर इतिहास के पन्नों पर अपनी विजयगाथा लिखी है।

रानी लक्ष्मीबाई ने अपने राज्य झांसी की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश राज्य के खिलाफ लड़ने का साहस किया और वे बाद में वीरगति को प्राप्त हुईं। लक्ष्मी बाई के वीरता के किस्से आज भी याद किए जाते हैं। रानी लक्ष्मी बाई ने अपने बलिदानों और साहसी कामों से न सिर्फ भारत देश को बल्कि पूरी दुनिया की महिलाओं का सिर गर्व से ऊंचा किया है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की जीवन देशभक्ति, अमर और बलिदान की एक अनुपम गाथा है।

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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मी बाई का प्रारंभिक जीवन – Rani Laxmi Bai History in Hindi

रानी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को उत्तरप्रदेश के वाराणसी के भदैनी नगर में हुआ था उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था जिन्हें सब प्यार से मनु कहकर पुकारते थे।

उनके पिता का नाम मोरोपन्त तांबे था। उनके पिता बिठुर में न्यायालय में पेशवा थे और उनके पिता आधुनिक सोच के व्यक्ति थे जो कि लड़कियों की स्वतंत्रता और उनकी पढ़ाई-लिखाई में भरोसा रखते थे। जिसकी वजह से लक्ष्मी बाई अपने पिता से काफी प्रभावित थी। उनके पिता ने रानी के बचपन से ही उनकी प्रतिभा को पहचान लिया था इसलिए उन्हें बचपन से ही उस दौर में भी अन्य लड़कियों के मुकाबले ज्यादा आजादी भी दी गई थी।

उनकी मां का नाम भागीरथीबाई था जो कि एक घरेलू महिला थी। जब ने 4 साल की थी तभी उनकी माता की मौत हो गई जिसके बाद उनके पिता ने लक्ष्मी बाई का पालन-पोषण किया।

आपको बता दें कि उनके पिता जब मराठा बाजीराव की सेवा कर रहे ते तभी रानी के जन्म के समय ज्योतिष ने मनु (लक्ष्मी बाई) के लिए भविष्यवाणी की थी और कहा था कि वे बड़ी होकर एक राजरानी होगी और हुआ भी ऐसे ही कि वे बड़ी होकर एक साहसी वीर झांसी की रानी बनी और लोगों के सामने अपनी वीरता की मिसाल पेश की। महारानी लक्ष्मी बाई ने अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ आत्म रक्षा, घुड़सवारी, निशानेबाजी और घेराबंदी की ट्रेनिंग ली थी जिससे वे शस्त्रविद्याओं में निपुण हो गईं।

झांसी की रानी का बचपन – Childhood of Rani Lakshmi Bai

मनु बाई बचपन से ही बेहद सुंदर थी उनकी छवि मनमोहक थी जो भी उनको देखता था उनसे बात करे बिना नहीं रह पाता था। उनके पिता भी मनु बाई की सुंदरता की वजह से उन्हें छबीली कहकर बुलाते थे। वहीं लक्ष्मी बाई की मां की मौत के बाद उनके पिता उन्हें बाजीराव के पास बिठूर ले गए थे जहां रानी लक्ष्मी बाई का बचपन बीता।

आपको बता दें कि बाजीराव के पुत्रों के साथ मनु खेल-कूद मनोरंजन करती थी और वे भाई-बहन की तरह रहते थे। वे तीनों साथ में खेलते थे और साथ में पढ़ाई-लिखाई भी करते थी। इसके साथ ही मनु बाई निशानेबाजी, घुड़सवारी, आत्मरक्षा, घेराबंदी की ट्रेनिंग भी लेती थी।

इसके बाद शस्त्रविद्याओं में निपुण होती चली गईं साथ एक अच्छी घुड़सवार भी बन गई। आपको बता दें कि बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र चलाना और घुड़सवारी करना लक्ष्मी बाई के दो प्रिय खेल थे।

रानी लक्ष्मी बाई की शिक्षा – About Jhansi ki Rani in Hindi

मनु बामनु बाई बचपन में पेशवा बाजीराव के पास रहती थी। जहां उन्होनें बाजारीव के पुत्रों के साथ अपनी पढ़ाई-लिखाई की। आपको बता दें कि बाजीराव के पुत्रों को पढ़ाने एक शिक्षक आते थे मनु भी उनके पुत्रों के साथ उसी शिक्षक से पढ़ती थीं।

नाना साहब की लक्ष्मी बाई को चुनौती

रानी लक्ष्मी बाई की बहादुरी के किस्से बचपन से ही थी। जी हां वे बड़ी से बड़ी चुनौतियां का भी बड़ी समझदारी और होशयारी से सामना कर लेती हैं। ऐसे ही एक बार जब वे घुड़सवारी कर रही थी तब नाना साहब ने मनु बाई से कहा कि अगर हिम्मत है तो मेरे घोड़े से आगे निकल कर दिखाओ फिर क्या था मनु बाई ने नानासाहब की ये चुनौती मुस्कराते हुए स्वीकार कर ली और नानासाहब के साथ घुड़सवारी के लिए तैयार हो गई।

जहां नानासाहब का घोड़ा तेज गति से भाग रहा था वहीं लक्ष्मी बाई के घोड़ा भी उसे पीछे नहीं रहा, इस दौरान नानासाहब ने लक्ष्मी बाई के आगे निकलने की कोशिश की लेकिन वे असफल रहे और इस रेस में वे घोड़े से नीचे गिर गए इस दौरान नाना साहब की चीख निकल पड़ी “मनु मै मरा” जिसके बाद मनु ने अपने घोड़े को पीछे मोड़ लिया और नाना साहब को अपने घोड़े में बिठाकर अपने घर की तरफ चल पड़ी।

इसके बाद न सिर्फ नानासाहब ने मनु को शाबासी दी बल्कि उनकी घुड़सवारी की भी तारीफ की और कहा कि मनु तुम घोड़ा बहुत तेज दौड़ाती हो तुमने तो कमाल ही कर दिया। उन्होनें मनु के सवाल पूछने पर ये भी कहा कि – तुम हिम्मत वाली हो और बहादुर भी। इसके बाद नानासाहब और रावसाहब ने मनु बाई की प्रतिभा को देख उन्हें शस्त्र विद्या भी सिखाई।

मनु ने नानासाहब से तलवार चलाना, भाला-बरछा फैकना और बंदूक से निशाना लगाना सीख लिया। इसके अलावा मनु व्यायामों में भी प्रयोग करती थी वहीं कुश्ती और मलखंभ उनके प्रिय व्यायाम थे।

रानी लक्ष्मी बाई का विवाह – Marriage of Rani Lakshmi Bai

रानी लक्ष्मी बाई की शादी महज 14 साल की उम्र में उत्तर भारत में स्थित झांसी के महाराज गंगाधर राव नेवालकर – Gangadhar Rao के साथ हो गया। इस तरह काशी की मनु अब झांसी की रानी बन गईं। आपको बता दें कि शादी के बाद उनका नाम लक्ष्मी बाई रखा गया था। उनका वैवाहिक जीवन सुख से बीत रहा था इस दौरान 1851 में उन दोनों को पुत्र को प्राप्ति हुई जिसका नाम दामोदर राव रखा गया।

उनका वैवाहिक जीवन काफी सुखद बीत रहा था कि लेकिन दुर्भाग्यवश वह सिर्फ 4 महीने से जीवित रह सका। जिससे उनके परिवार में संकट के बादल छा गए। वहीं पुत्र के वियोग में महाराज गंगाधर राव नेवालकर बीमार रहने लगे। इसके बाद महारानी लक्ष्मी बाई और महाराज गंगाधर ने अपने रिश्तेदार का पुत्र को गोद लेना का फैसला लिया।

गोद लिए गए पुत्र के उत्तराधिकार पर ब्रिटिश सरकार कोई दिक्कत नहीं करे इसलिए उन्होनें ब्रिटिश सरकार की मौजूदगी में पुत्र को गोद लिया बाद में य़ह काम ब्रिटिश अफसरों की मौजूदगी में पूरा किया गया आपको बता दें कि इस गोद लिए गए बालक का नाम पहले आनंद राव था जिसे बाद में बदलकर दामोदर राव रखा गया।

रानी लक्ष्मी बाई ने संभाला राज-पाठ

लगातार बीमार रहने के चलते एक दिन महाराज गंगाधर राव नेवालकर की तबीयत ज्यादा खराब हो गई और 21 नवंबर 1853 को उनकी मृत्यु हो गई। उस समय रानी लक्ष्मी बाई महज 18 साल की थी। पुत्र के वियोग के बाद राजा की मौत की खबर से रानी काफी आहत हुईं लेकिन इतनी कठिन परिस्थिति में भी रानी ने धैर्य नहीं खोया वहीं उनके दत्तक पुत्र दामोदर की आयु कम होने की वजह से उन्होनें राज्य का खुद उत्तराधिकारी बनने का फैसला लिया। उस समय लार्ड डलहौजी गर्वनर था।

रानी के उत्तराधिकारी बनने पर ब्रिटिश सरकार ने किया था विरोध

महारानी लक्ष्मी बाई धैर्यवान और साहसी महिला थी इसलिए वे हर काम को बड़ी सूझबूझ और समझदारी से करती थी यही वजह थी वे राज्य का उत्तराधिकारी बनी रही। दरअसल जिस समय रानी को उत्तरधिकारी बनाया गया था उस समय यह नियम था कि अगर राजा का खुद का पुत्र हो तो उसे उत्तराधिकारी बनाया जाएगा। अगर पुत्र नहीं है तो उसका राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी में मिला दिया जाएगा।

इस नियम के चलते रानी को उत्तराधिकारी बनने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा वहीं ब्रिटिश शासकों ने राजा गंगाधर राव नेवालकर की मौत का फायदा उठाने की तमाम कोशिशें की और वे झांसी को ब्रिटिश शासकों में मिलाना चाहते थे।

ब्रिटिश सरकार ने झांसी राज्य को हथियाने की हर कोशिश कर ली यहां तक कि ब्रिटिश शासकों ने महारानी लक्ष्मी बाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया। यहां तक कि निर्दयी शासकों ने रानी के राज्य का खजाना भी जब्त कर लिया इसके साथ ही राजा नेवालकर ने जो कर्ज लिया था।

उसकी रकम, रानी लक्ष्मी बाई के सालाना आय से काटने का फैसला सुनाया। जिसकी वजह से लक्ष्मी बाई को झांसी का किला छोड़कर झांसी के रानीमहल में जाना पड़ा। इस कठिन संकट से भी रानी लक्ष्मी बाई फिर भी घबराई नहीं। और वे अपने झांसी राज्य को ब्रिटिश शासकों के हाथ सौंपने नहीं देने के फैसले पर डटी रहीं।

महारानी लक्ष्मी बाई ने झांसी को हर हाल में बचाने की ठान ली और अपने राज्य को बचाने के लिए सेना संगठन शुरु किया।

(“मै अपनी झांसी नहीं दूंगी”)

झांसी को पाने की चाह रखने वाले ब्रिटिश शासकों ने 7 मार्च, 1854 को एक सरकारी गजट जारी किया था। जिसमें झांसी को ब्रिटिश सम्राज्य में मिलाने का आदेश दिया गया था। जिसके बाद झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने ब्रिटिश शासकों के इस आदेश का उल्लंघन करते हुए कहा कि (Rani Laxmi Bai Dialog) –

“मै अपनी झांसी नहीं दूंगी”

जिसके बाद ब्रिटिश शासकों के खिलाफ विद्रोह तेज हो गया। इसके बाद झांसी को बचाने में जुटी महारानी लक्ष्मी बाई ने कुछ अन्य राज्यों की मद्द से एक सेना तैयार की, जिसमें बड़े पैमाने पर लोगों ने अपनी भागीदारी निभाई वहीं इस सेना में महिलाएं भी शामिल थी, जिन्हें युद्ध में लड़ने के लिए ट्रेनिंग दी गई थी इसके अलावा महारानी लक्ष्मी बाई की सेना में अस्त्र-शस्त्रों के विद्धान गुलाम खान, दोस्त खान, खुदा बक्श, काशी बाई, मोतीबाई, सुंदर-मुंदर, लाला भाऊ बक्शी, दीवान रघुनाथ सिंह, दीवान जवाहर सिंह समेत 1400 सैनिक शामिल थे।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई की भूमिका – Role of Rani Lakshmi Bai in Revolt of 1857

10 मई, 1857 को अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरु हो गया। इस दौरान बंदूकों की गोलियों में सूअर और गौमांस की परत चढ़ा दी गई जिसके बाद हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं काफी आहत हुईं इसी वजह से पूरे देश में आक्रोश फैल गया था जिसके बाद ब्रिटिश सरकार को इस विद्रोह को न चाहते हुए भी दबाना पड़ा और झांसी को महारानी लक्ष्मी बाई को सौंप दिया।

इसके बाद 1857 में उनके पड़ोसी राज्य ओरछा और दतिया के राजाओं ने झांसी पर हमला कर दिया लेकिन महारानी लक्ष्मी बाई ने अपनी बहादुरी का परिचय दिया और जीत हासिल की।

1858, में फिर अंग्रेजों ने किया झांसी पर हमला

मार्च 1858 में एक बार फिर झांसी राज्य में कब्जा करने की जीद में अंग्रेजों ने सर हू्य रोज के नेतृत्व में झांसी पर हमला कर दिया। लेकिन इस बार झांसी को बचाने के लिए तात्या टोपे के नेतृत्व में करीब 20,000 सैनिकों के साथ लड़ाई लड़ी। यह लड़ाई करीब 2 हफ्ते तक चली।

इस लड़ाई में अंग्रेजों ने झांसी के किले की दीवारें तोड़कर यहां कब्जा कर लिया। इसके साथ ही अंग्रेजी सैनिकों में झांसी में लूट-पाट शुरु कर दी इस संघर्ष के समय में भी रानी लक्ष्मी बाई ने साहस से काम लिया और किसी तरह अपने पुत्र दामोदर राव को बचाया।

तात्या टोपे के साथ काल्पी की लड़ाई

1858 के युद्ध में जब अंग्रेजों ने झांसी पर कब्जा कर लिया इसके बाद झांसी की रानी लक्ष्मी बाई अपने दल के साथ काल्पी पहुंची। यहां तात्या टोपे ने महारानी लक्ष्मी बाई का साथ दिया। इसके साथ ही वहां के पेशवा ने वहां की हालत को देखते हुए रानी को कालपी में शरण दी इसके साथ ही उन्हें सैन्य बल भी दिया।

22 मई 1858, को अंग्रेजी शासक सर हू्य रोज ने काल्पी पर हमला कर दिया तभी रानी ने अपनी साहस का परिचय देते हुए अंग्रेजों को हार की धूल चटाई जिसके बाद अंग्रेज शासकों को पीछे हटना पड़ा। वहीं हार के कुछ समय बाद फिर से सर हू्य रोज ने काल्पी पर हमला कर दिया लेकिन इस बार वे जीत गए।

महारानी लक्ष्मी बाई को ग्वालिर पर अधिकार लेने का सुझाव

काल्पी की लड़ाई में मिली हार के बाद राव साहेब पेशवा, बन्दा के नवाब, तात्या टोपे और अन्य मुख्य योद्दाओं ने महारानी लक्ष्मी बाई को ग्वालियर पर अधिकार प्राप्त करने का सुझाव दिया। जिससे रानी अपनी मंजिल तक पहुंचने में सफल हो सके फिर क्या था।

हमेशा अपने लक्ष्य पर अडिग रहने वाली महारानी लक्ष्मी बाई ने तात्या टोपे के साथ मिलकर ग्वालियर के महाराजा के खिलाफ लड़ाई की लेकिन इस लड़ाई में तात्या टोपे ने पहले ही ग्वालियर की सेना को अपनी तरफ मिला लिया था वहीं दूसरी तरफ अग्रेज भी अपनी सेना के साथ ग्वालियर आ धमके थे लेकिन इस लड़ाई में ग्वालियर के किले पर जीत हासिल की इसके बाद उन्होनें ग्वालियर का राज्य पेशवा को सौंप दिया।

रानी लक्ष्मी बाई की मृत्यु – Rani Lakshmi Bai Death

17 जून 1858, में रानी लक्ष्मी बाई ने किंग्स रॉयल आयरिश के खिलाफ लड़ाई लड़ी और ग्वालियर के पूर्व क्षेत्र का मोर्चा संभाला इस युद्ध में रानी के साथ उनकी सेविकाओं ने भी उनका साथ दिया। लेकिन इस युद्द में रानी का घोडा़ नया था क्योंकि रानी का घोड़ा ‘राजरतन’ पिछले युद्द में मारा गया था।

इस युद्ध में रानी को भी अंदेशा हो गया था कि ये उनके जीवन की आखिरी लड़ाई है। वे इस स्थिति को समझ गई और वीरता के साथ युद्ध करती रहीं। लेकिन इस युद्द में रानी बुरी तरह घायल हो चुकी ती और वे घोड़े से गिर गईं। रानी पुरुष की पोषाक पहने हुए थे इसलिए अंग्रेज उन्हें पहचान नहीं पाए और रानी को युद्ध भूमि में छोड़ गए।

इसके बाद रानी के सैनिक उन्हें पास के गंगादास मठ में ले गए और उन्हें गंगाजल दिया जिसके बाद महारानी लक्ष्मी ने अपनी अंतिम इच्छा बताते हुए कहा कि “कोई भी अंग्रेज उनके शरीर को हाथ नहीं लगाए “।

इस तरह 17 जून 1858 को कोटा के सराई के पास रानी लक्ष्मी बाई ग्वालियर के फूलबाग क्षेत्र में वीरगति को प्राप्ति हुईं। साहसी वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई ने हमेशा बहादुरी और हिम्मत से अपने शत्रुओं को पराजित कर वीरता का परिचय किया और देश को स्वतंत्रता दिलवाने में उन्होनें अपनी जान तक न्यौछावर कर दी।

वहीं युद्ध लड़ने के लिए रानी लक्ष्मी के पास न तो बड़ी सेना थी और न ही कोई बहुत बड़ा राज्य था लेकिन फिर भी रानी लक्ष्मी बाई ने इस स्वतंत्रता संग्राम में जो साहस का परिचय दिया था, वो वाकई तारीफ-ए-काबिल है। रानी की वीरता की प्रशंसा उनके दुश्मनों ने भी की है। वहीं ऐसी वीरांगनाओं से भारत का सिर हमेशा गर्व से ऊंचा रहेगा। इसके साथ ही रानी लक्ष्मी बाई बाकि महिलाओं के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत हैं।

रानी लक्ष्मीबाई की उपलब्धिया – Achievements of Rani Lakshmi Bai

  • पती की मृत्यू के बाद रानी ने अपने राज्य झांसी की कमान खुद संभालने का निर्णय लिया था, जिसमे उन्हे अंग्रेजो से और नजदीकी संस्थानो के राजाओ से बहुत बार विरोध और युध्द जैसे हालात का भी सामना करना पडा था। पर वो अंतिम वक्त तक अडिग रही, पर उसने अपना शासन मृत्यू तक अंग्रेजो को नही सौपा।
  • रानी ने अपने राज्य मे सेना को तैयार करने पर और उसे मजबूत करने पर बहुत ज्यादा कार्य किया था, जिसमे उन्होने महिलाओ को भी सेना मे भर्ती कराया था।
  • सितम्बर 1857 मे रानी के राज्य झांसी पर पडोसी राज्य ओरछा और दतिया के राजाओ ने आक्रमण किया था, जिसका पूर्णतः पराजय कर रानी ने अपने सामर्थ्य का लोहा मनवाया था।
  • अंग्रेज कैप्टन ह्यु रोज ने रानी लक्ष्मीबाई के बारे मे गौरव शब्द कहे थे के,”1857 के विद्रोह की रानी लक्ष्मीबाई सबसे खतरनाक विद्रोही के रूप मे सामने आयी थी, जिसने अपने सुझ बुझ, साहस और निडरता का परिचय देकर अंग्रेजो का कडवा प्रतिकार किया था”
  • भारतीय इतिहास मे रानी लक्ष्मीबाई को शहीद वीरांगना के रूप मे पहचाना जाता है, जो साहस, शूर विरता और नारी शक्ती के रूप मे आदर्श मानी जाती है।
  • रानी लक्ष्मीबाई के अंग्रेजो के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष ने बादमे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे सभी को बल देने का कार्य किया जिसमे वो खासकर महिलाओ के लिये प्रेरणा स्त्रोत के रूप मे स्मरणीय रही।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के कथन/वचन – Rani of Jhansi Quotes in Hindi

  • “यदि युध्द के मैदान मे हार गये और मारे गये तो निश्चित रूप से मोक्ष प्राप्त करेंगे।”
  • “मै अपने झांसी का आत्म समर्पण नही होने दुंगी।”
  • “मैदाने जंग मे मारना है, फिरंगी से नही हारना है।”
  • “हम स्वयं को तैयार कर रहे है, यह अंग्रेजो से लडने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।”
  • “उन्होने कैदियो को अपनी रोटी खाने के लिए मजबूर किया, वे हड्डियों को पावडर मे बदलते है और फिर आटा,शक्कर आदि वस्तूए एक साथ मिलाकर उसे बिक्री के लिए उजागर करते है।”

रानी की बहादुरी पर लिखीं गई किताबें और फिल्में – Rani Lakshmi Bai Movie and Poem, Books

झांसी की रानी का बहादुरी का वर्णन सुभद्रा चौहान ने ‘झांसी की रानी’ समेत अपनी कई कविताओं में किया है इसमें से कई भारतीय स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं। इसके साथ ही रानी लक्ष्मीबाई को भारतीय उपन्यासों, कविता और फिल्मों में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में भी चित्रित किया गया है।

यही नहीं महारानी लक्ष्मी बाई के जीवन पर कई फिल्में और टेलीविजन सीरीज बनाई गई हैं।

  1. ‘द टाइगर एंड द फ्लेम’ (1953) और ‘माणिकर्णिका: ‘द क्वीन ऑफ झांसी’ (2018) हैं, ‘झांसी की रानी’ (2009) उनके जीवन पर आधारित फिल्मे हैं। लक्ष्मीबाई की बहादुरी का वर्णन करते हुए कई किताबें और कहानियां भी लिखी गई हैं।
  2. जिनमे से सुभद्रा कुमारी चौहान ‘झांसी की रानी’ (1956) लिखी जबकि जयश्री मिश्रा ने ‘रानी’ (2007) लिखी हैं। इसके अलावा एक वीडियो गेम ‘द ऑर्डर: 1886’ (2015) भी रानी लक्ष्मी बाई के जीवन से प्रेरित था।

रानी लक्ष्मी बाई की विशेषताएं – Facts about Rani Laxmi Bai in Hindi

  • लक्ष्मी बाई रोजाना योगाभ्यास करती थी रानी लक्ष्मी बाई की दिनचर्या में योगाभ्यास शामिल था।
  • रानी लक्ष्मी बाई को अपनी प्रजा से बेहद लगाव और स्नेह था वे अपनी प्रजा का बेहद ध्यान रखती थी।
  • रानी लक्ष्मी बाई गुनहगारों को उचित सजा देने की हिम्मत रखती थी।
  • सैन्य कार्यों के लिए रानी लक्ष्मी बाई हमेशा उत्साहित रहती थी इसके साथ ही वे इन कार्यों में निपुण भी थी।
  • रानी लक्ष्मी बाई को घोडो़ं की भी अच्छी परख थी उनकी घुड़सवारी की प्रशंसा बड़े-बड़े राजा भी करते थे।

महारानी लक्ष्मी बाई एक विरासत के रूप में रानी की बहादुरी की गाथा कई पीढ़ियों तक याद रखी जाए इसलिए झांसी में महारानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कॉलेज, ग्वालियर में लक्ष्मीबाई नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ फिजिकल एजुकेशन और झांसी में रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय का नाम उनके सम्मान में रखा गया है।

इसके साथ ही वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई की प्रतिमाएं अपने बेटे के साथ भारत भर में कई स्थानों पर बनी हुईं हैं। भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित करने वाली झाँसी की रानी एक आदर्श वीरांगना थी।

सच्चा वीर कभी आपत्तियों से नही घबराता। उसका लक्ष्य हमेशा उदार और उच्च होता है। वह सदैव आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ट होता है। और ऐसी ही वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी।

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